उस लेखन में है, उन लफ्जो़ में है, तू सितार की हर धुन में है क्यों करना तुझे सर-ए-आम जब मैं तेरा गीत ही नहीं। वो मौसम भी है वो वादियाँ भी हैं उन पक्क्षियों की चहचहाट भी है वो बसेरा भी है, वो ठिकाना भी है अंजानों की बस्ती में मेरे दोस्त, आज तेरा ज़माना भी है | हवा भी वही एहसास भी वही आँखों के दरमियां प्यास भी वही वक्त का पैमाना भी वही गलियों की करवटें भी वही सड़क का मोड़ भी वही तुझसे मिलने की होड़ भी वही | -Dirgha Pandey :)
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