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पुरुष का प्रेम

ये कथा उस पुरुष से प्रेरित है जिसने प्रेम किया भी खूब है और उसे जिया भी खूब है। पुरुष के प्रेम से आत्मविश्वास हो जाए जागृत ये किसी चमत्कार से कम नहीं। उसमें स्त्रीत्व की भावना भी होती है इस में कोई विस्मय या ब्रह्म नहीं। पौरुष वास्तव में है क्या? शौर्य का प्रतीक चाहे हृदय में कितनी ही पीड़ा हो। अगर टूट जाए सब्र का बांध उसका  तो शब्दों के बाण में भी सीमा हो। कठिन मार्ग में भी रखता जो आशा हो और सदैव बताता धैर्य की उचित परिभाषा हो। स्त्री का आंतरिक प्रतिबिम्ब पुरुष  स्त्री का पूरक भी पुरुष  मानो लहरों में बादलों का दर्पण वृक्षों की टहनियों समान सागर में नदियों का समर्पण। जैसे फूल को चूमती हवा  रोगी काया की सर्वोत्तम दवा। प्रेम की नौका का जल एवं स्त्री की हर दुविधा का हल। वह पुरुष है। उसका प्रेम कोमल जैसे आँचल में गिरता हुआ पंख दुर्लभ जैसे समुद्र में पाया गया हो शंख। शीतल जैसे पैरों को छूती गीली घास मासूम जैसे प्रत्येक स्त्री की आस। अरे! पुरुष का प्रेम तो असंतोष में स्थिरता दे जाता है जब कष्ट में वो तुम्हें माँ बनकर सहलाता है| दो प्रशंसा भरे शब्द सुन मन ही मन यूँ इठलाता ...

To my dear

To my dear once-loved, You are flourishing, it's true. I told you how quickly you'd move on, How joy would find you with each new dawn. It was my wish, and it had to come true, To see you happy, as I always knew. Your life now flows, so light, so free, A painless path, as it was meant to be. You promised to stand by me, through thick and thin, A steady hand, no matter where I'd been. But you cut me off, like I was just one more, A fleeting thought, erased and ignored. You never loved me, just played the role, Pretending well before them all. But I couldn't fulfill my dream— you , For you never wished for me, too. :) To my dear once-loved, You are flourishing, it's true. ***** -dp :)

दूर

एक कल्पना की थी मैंने, कि जो सोचूँ वो हो जाऊँ  एक तेरा होना चाहा मैंने  क्या मालूम था मुझे, कि हस्ती खो बैठूंगी। मेरा सितारा, नज़ारा और क्या कहा था तुमने मुझे आँखों का तारा? ज्वलशील तारे समान ही अब बिखर बैठूंगी अकेला तो इतना कर दिया है तुम्हारी अनुपस्थिती ने मुझे अपने साथ भी बैठी अगर,  दूर  बैठूंगी। जीवन क्या है, सुकून क्या है तेरी आँखें जो हैं, तेरी मुस्कान जो है मन की डिब्बी में एकाएक सिमटा हुआ तेरा होना जो है, तेरा रहना जो है। -dp :)

वो प्रेम ढूँढ रही हूँ

  ऐसे दिन बिताने की वजह क्या जो दिन कब बीते पता क्या तुमसे पहले क्या और बाद क्या  मैंने रचा क्या और मेरे पास बचा क्या? कुछ भी तो नहीं. . . . एक शांत जगह खोज कर  आपकी मूक तस्वीरें देख रही हूँ  ठहरी हवा में भी शोर सी मन ही मन चीख रही हूँ  मैं आज भी आपका इंतज़ार कर रही हूँ  सूक्ष्म हवाएँ कैसी हैं? उस जगह की आहटों तक पहुँचना कैसा है? बादलों को चीरती हुई आज भी  यही अनुमान लगा रही हूँ  माँ, आपका इंतज़ार कर रही हूँ  इन फूल-पत्तों और बूँदों में शायद  जो आपसे मिलता आया- वो प्रेम ढूँढ रही हूँ आप के बाद जिस जीवन का आधार कल्पना से परे था  वो जिंदगी भी जी रही हूँ  मैं आज भी माँ आपका इंतज़ार कर रही हूँ  रंगो से आपको ही लिखा  उस लेख में आपको ही माँगा  शब्दों के मध्य  आपके व्यक्तित्व का कोष बुन रही हूँ  मैं आपका इंतज़ार आज भी कर रही हूँ । ****** - दीर्घा :) (in the memory of my beloved mother) 

लालसा सन्यास की. . .

आग   की   जलन   भी   मैं , गर्भ   की   तपन   भी   मैं , मैं   पर्वतों   के   धीर   सी और   बर्फ   में   भी   नीर   सी। मैं  वायु   का   प्रकोप   हूँ , न   दोहा   न   श्लोक   हूँ , जीत   में   नि : शब्दता , हार   में   प्रलोभ   हूँ। कभी   धूमिल   सी , कभी   उजली - उजली , नाट्य   पात्र   बन   नायिका   सी कभी   हितैषी   कभी   बैरी , मैं   हर   पहलू   के   हिस्से   सी। सारांश   में   साहित्य   मैं , संबंध   में   कर्तव्य   भी रेत   में   लिखी   कहानी   हूँ , मैं   मृगतृष्णा   की   रानी   हूँ। आक्षेप   में   भी   फिक्र   सी , कोमल   स्पर्श   के   ज़िक्र   सी प्रेमपूर्ण   ह्रदय   सहित , सन्नाटे   में   कहर   सी सैकड़ों   ध्वनियों ...

अब वो बात नहीं....

"Yeh duniya nahi hai mere pas to kya... Mera ye bhram tha mere pas tum ho..." सुनो , मैं एक लहजा थी उसके तेवर में   आज वो मुझे शब्द मात्र कहता है   मैं तो उसके चलचित्र का हिस्सा थी   वो मुझमें महज़ पात्र देखता है।   नजरें जिसकी मुझपर आकर ठहरती थी , आज उसे मैं दर्शन मात्र दिखती हूँ   मुझसे होता था दिन शुरु जिसका , आज मैं उससे सायंकाल में भी कहाँ मिलती हूँ।   मुझे जान और ज़िंदगी बोला उसने   किताबी और अकल्पनीय था पर   मान लिया मैंने स्थान मेरा सदैव मुझे दिखाया गया फिर भी हर सत्य से मुँह मोड़ा मैंने।   इतनी यादें बनाई हमने उसने एक झटके में सब मिटा दिया   लोग कहते हैं कि मेरे लिये बहुत कुछ किया है उसने   क्या हुआ जब वास्तव में ठहरने का समय आगया ?   उसे प्रेम हुआ एक निडर ,  प्रेरणात्मक और उदारवादी नारी से   जिस पल वो टूट गई ,  वो प्रेम कहीं छूट गया   यह कैसा लगाव है यह कैसा बदलाव है उन्नती में समक्ष और अवनति में ओझल सा ?   अरे! मैं तो नूर थी उसके चेहरे का...