आपकी बहुत याद आती है मम्मी. . . . माँ! मैं आपको हर रूप में पसंद थी ना, हर भेष में मेरी सरलता में आप प्रसन्न हो जाती थी और उलझन में भी मैं आपको खूब लुभाती थी। मैं उस एकाग्र मन से मुझे चाहने वाली दूसरी कौन-सी लाऊँगी? आप नहीं हो माँ अब मैं मेरी हँसी हँस कैसे पाऊँगी? आप मुझे जिस प्रेम से देखती थी, रखती थी वह यहाँ अब नहीं रहा मेरा सब कुछ आप तक था- हर प्रेम हर स्नेह हर सुकून। मैं मन की ज्वाला को शीतलता कैसे प्रदान कर पाऊँगी? आप नहीं हो माँ अब मैं मेरी हँसी हँस कैसे पाऊँगी? मेरी आगे बढ़ने की इच्छा मिट चुकी है मुझे न किसीसे जीतना है, न खुद को विजेता घोषित करना, मुझे बस आप के निकट ही रहना है। मेरे वजूद का अर्थ मैं कहाँ से लाऊँगी? आप नहीं हो माँ अब मैं मेरी हँसी हँस कैसे पाऊँगी? मेरी तरक्की में मुझे आपकी कमी खलेगी और जब मैं विफल हो जाऊँगी तो भी मुझे आपका न होना रुला देगा। आप में मेरी आजादी बंद थी, अब मैं स्वतंत्र कहाँ कहलाऊँगी, आप नहीं हो माँ अब मैं मेरी हँसी हँस कैसे पाऊँगी? हमारी इतनी कल्पनाएँ अधूरी रह गई- जिस उमंग से हम भविष्य की परियोजना बनाते थे, उस उल्लास से मैं शायद कभ...
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