"Yeh duniya nahi hai mere pas to kya... Mera ye bhram tha mere pas tum ho..." सुनो , मैं एक लहजा थी उसके तेवर में आज वो मुझे शब्द मात्र कहता है मैं तो उसके चलचित्र का हिस्सा थी वो मुझमें महज़ पात्र देखता है। नजरें जिसकी मुझपर आकर ठहरती थी , आज उसे मैं दर्शन मात्र दिखती हूँ मुझसे होता था दिन शुरु जिसका , आज मैं उससे सायंकाल में भी कहाँ मिलती हूँ। मुझे जान और ज़िंदगी बोला उसने किताबी और अकल्पनीय था पर मान लिया मैंने स्थान मेरा सदैव मुझे दिखाया गया फिर भी हर सत्य से मुँह मोड़ा मैंने। इतनी यादें बनाई हमने उसने एक झटके में सब मिटा दिया लोग कहते हैं कि मेरे लिये बहुत कुछ किया है उसने क्या हुआ जब वास्तव में ठहरने का समय आगया ? उसे प्रेम हुआ एक निडर , प्रेरणात्मक और उदारवादी नारी से जिस पल वो टूट गई , वो प्रेम कहीं छूट गया यह कैसा लगाव है यह कैसा बदलाव है उन्नती में समक्ष और अवनति में ओझल सा ? अरे! मैं तो नूर थी उसके चेहरे का...
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