अंधाधुंध समाज में पल भर का ठहराव पाने की कितनी दौड़ है, अनजान शहर में इतरा के चलने का मज़ा भी कुछ और है । नही ? ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ? भीड़ बहुत है यहाँ अपनो की, सपनों की, नेकी की और तो और अपनो के ही घर में रेकी की । कुछ पाने की तलब कहूँ या सुकून की तलाश, क्यों लोगों की खुशियाँ केवल एक दूजे से आगे बढ़ने में सिमटकर रह गई हैं ? आधुनिक प्रतीत होने की होड़ कहूँ या दर्द मिटाने का एहसास, क्यों खूबसूरती की कीमत बस मोबाइल फोन में ही कैद हो गई है ? ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ? लालसा ने बेड़ियों में ऐसे जकड़ लिया है मानो इच्छाओं के गुलाम हों तुम । स्थिरता पाने की ख़्वाहिश लिए अब तक भटक रहे हो तुम । आकांक्षाएँ इतनी हावी कैसे हो गयी तुम पर ? राहत की खोज में और कितना तड़पोगे तुम ? अपने कार्य में मशगूल हो अगर परमानंद क्यों नहीं मगर अन्वेषण तुम्हें किस चीज़ का है क्यों बेचैन हो हर पहर ? ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्...
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