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Showing posts from December, 2019

न है कोई आस ।

मंज़िल पाने की ख़्वाहिश किसे नहीं होती ? टूट कर बिखर जाने का डर किसे नही होता ? उस रास्ते के अंत तक पहुँचने के बाद हाथ छूट जाने का दर्द किसे नहीं होता ? जीत के भी हार जाने पर कौन नही रोता ? शायद उसने भी यह महसूस किया होगा, जूझा होगा, अनुभव किया होगा शायद उसे भी चोट लगी होगी वह भी समाज से मिटा होगा उसका भी उपहास हुआ होगा । आख़िर मुझे भी तो ताने कसे गए थे । कोसा गया, हर दिन ज़ख्म दिए गए और व्यंग्यों से घेरा गया था । पर मेरे इरादे कभी कमज़ोर नही पड़े क्योंकि मेरी चाहत था वो । बेड़ियां तोड़कर, हिम्मत जुटाकर जो खुद को खड़ा किया था मैंनें, उसे चाहने के लिए । आख़िर वो ही तो एक उम्मीद थी मेरी जिसने हार मान ली । अब कुछ न रहा मेरे पास न समाज और न ही उपहास खलती एक ही चीज़ है मगर, कि वो नही अब पास न है उसके लौट आने की कोई आस । -Dirgha Pandey :)