मैंने समुद्र छुआ, वह आकाश हो गया बादल छुआ, वह प्रकाश हो गया पर्वत छुआ, वह कैलाश हो गया जब जब दुआएं मांगी, ईश्वर का अवकाश हो गया घसीटती गई पैरों को रेत पर, मुझसे रेत का टीला निराश हो गया झूठ फरेब से सिंची हुई, एक कली का सर्वनाश हो गया। तुमने मुझे काव्य से बांधा और मिठास से पिरोया, नीरवता से भी मेरा परिचय तुमने ही करवाया, तुमने मेरे लिए कई गीत गाए, गीतों में मुझे गाया तुम्हारा हर पद्य आज पलाश हो गया, मैंने समुद्र छुआ, वह आकाश हो गया। नौका भी थी, किनारा भी था, लहरें भी थी, हवा का रुख भी था बस उस पार तुम नहीं थे तुम होते भी क्यों, कोई नाता थोड़ी है प्रेम दोतरफ़ा से एकतरफ़ा ना हो, नदी का किनारा थोड़ी है। बस इसी विडंबना में मोह एक अभिलाष हो गया मैंने समुद्र छुआ, वह आकाश हो गया। रेगिस्तान में मैंने सरगम देखी ध्वनि थी कुछ हवाओं में, कंकड़ जो बज उठे देखते ही देखते फिज़ाओं में, ज्वाला भरा टीला मुझे तुम्हारी याद दिला रहा था एक तूफान सा जब दबे पांव मेरी ओर आ रहा था मैं तो खींचती चली गई उसकी ख़ामोशी में, और सरगम का विनाश हो गया मैंने समुद्र छुआ, वह आकाश हो गया। तुमने...