आग की जलन भी मैं , गर्भ की तपन भी मैं , मैं पर्वतों के धीर सी और बर्फ में भी नीर सी। मैं वायु का प्रकोप हूँ , न दोहा न श्लोक हूँ , जीत में नि : शब्दता , हार में प्रलोभ हूँ। कभी धूमिल सी , कभी उजली - उजली , नाट्य पात्र बन नायिका सी कभी हितैषी कभी बैरी , मैं हर पहलू के हिस्से सी। सारांश में साहित्य मैं , संबंध में कर्तव्य भी रेत में लिखी कहानी हूँ , मैं मृगतृष्णा की रानी हूँ। आक्षेप में भी फिक्र सी , कोमल स्पर्श के ज़िक्र सी प्रेमपूर्ण ह्रदय सहित , सन्नाटे में कहर सी सैकड़ों ध्वनियों ...
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