अंधाधुंध समाज में पल भर का ठहराव पाने की कितनी दौड़ है,
अनजान शहर में इतरा के चलने का मज़ा भी कुछ और है ।
नही ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
भीड़ बहुत है यहाँ
अपनो की,
सपनों की,
नेकी की
और तो और
अपनो के ही घर में रेकी की ।
कुछ पाने की तलब कहूँ या सुकून की तलाश,
क्यों लोगों की खुशियाँ केवल एक दूजे से आगे बढ़ने में सिमटकर रह गई हैं ?
आधुनिक प्रतीत होने की होड़ कहूँ या दर्द मिटाने का एहसास,
क्यों खूबसूरती की कीमत बस मोबाइल फोन में ही कैद हो गई है ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
लालसा ने बेड़ियों में ऐसे जकड़ लिया है
मानो इच्छाओं के गुलाम हों तुम ।
स्थिरता पाने की ख़्वाहिश लिए अब तक भटक रहे हो तुम ।
आकांक्षाएँ इतनी हावी कैसे हो गयी तुम पर ?
राहत की खोज में और कितना तड़पोगे तुम ?
अपने कार्य में मशगूल हो अगर
परमानंद क्यों नहीं मगर
अन्वेषण तुम्हें किस चीज़ का है
क्यों बेचैन हो हर पहर ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
चलो! पा लिया तुमने सब कुछ
मंज़िल तक भी पहुँच गए
फिर उठे मनोरथ के अंगारे
लो, तुम फिर उसी राह पर चल दिए ।
यह रीत कब तक दोहराओगे ?
कब पूछोगे खुदसे क्या चाहत है तुम्हारी ?
वो चाहत जो परे है
हर झूठ-फरेब से
समाज के सही-गलत से
तेरे-मेरे हर किस्से से
धैर्य मापने के सिलसिले से ।
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
फिर वही रोज़ की शाम
कुछ के यार दोस्त तो कुछ की
किताबों के नाम,
मन टटोलो कभी
हर वस्तु से परिपूर्ण हो तुम
चाहिए तो बस इस दौड़ में आराम ।
- Dirgha Pandey
अनजान शहर में इतरा के चलने का मज़ा भी कुछ और है ।
नही ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
भीड़ बहुत है यहाँ
अपनो की,
सपनों की,
नेकी की
और तो और
अपनो के ही घर में रेकी की ।
कुछ पाने की तलब कहूँ या सुकून की तलाश,
क्यों लोगों की खुशियाँ केवल एक दूजे से आगे बढ़ने में सिमटकर रह गई हैं ?
आधुनिक प्रतीत होने की होड़ कहूँ या दर्द मिटाने का एहसास,
क्यों खूबसूरती की कीमत बस मोबाइल फोन में ही कैद हो गई है ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
लालसा ने बेड़ियों में ऐसे जकड़ लिया है
मानो इच्छाओं के गुलाम हों तुम ।
स्थिरता पाने की ख़्वाहिश लिए अब तक भटक रहे हो तुम ।
आकांक्षाएँ इतनी हावी कैसे हो गयी तुम पर ?
राहत की खोज में और कितना तड़पोगे तुम ?
अपने कार्य में मशगूल हो अगर
परमानंद क्यों नहीं मगर
अन्वेषण तुम्हें किस चीज़ का है
क्यों बेचैन हो हर पहर ?
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
चलो! पा लिया तुमने सब कुछ
मंज़िल तक भी पहुँच गए
फिर उठे मनोरथ के अंगारे
लो, तुम फिर उसी राह पर चल दिए ।
यह रीत कब तक दोहराओगे ?
कब पूछोगे खुदसे क्या चाहत है तुम्हारी ?
वो चाहत जो परे है
हर झूठ-फरेब से
समाज के सही-गलत से
तेरे-मेरे हर किस्से से
धैर्य मापने के सिलसिले से ।
ज़रा रुको, अपने आप से यह सवालात क्यों नहीं करते ? क्या वजह है, क्यों नहीं ठहरते तुम ?
फिर वही रोज़ की शाम
कुछ के यार दोस्त तो कुछ की
किताबों के नाम,
मन टटोलो कभी
हर वस्तु से परिपूर्ण हो तुम
चाहिए तो बस इस दौड़ में आराम ।
- Dirgha Pandey
Very well written, Dirgha! 👌👌
ReplyDelete🙏🏻🙏🏻🙏🏻😊
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