कभी सुना तस्वीर को गुनगुनाते हुए और समा को थमते हुए? ना हो सका उल्लेख जिसका उस किस्से को बुनते हुए? कुछ दृश्य इतने ओझल कहानी उनकी उतनी ही कोमल समीप गए तो झिझक मिटती गई धुंध नज़र से हटती गई झलक की ललक बढ़ती गई और कथा अपनी सीढ़ी चढ़ती गई। छूटी हुई है एक कहानी पात्रों की व्याख्या न हो मुख-ज़ुबानी, जोड़ में पृथक हैं दोनों मानो, कमल का फूल और ताल का पानी। उनमें वार्तालाप नहीं, केवल स्पर्श है, एहसास ऐसा जिसमें शब्द का मोह नहीं एक लहरता हुआ एक तैरता हुआ एक झूमता हुआ एक संवरता हुआ। अंजाम से अनजान हैं क्योंकि आरंभ और अंत आम हैं ख़ास है वो लम्हा जिसमें आक्षेप तो है मगर फ़िक्र सर-ए-आम है फ़िक्र सर-ए-आम है।। Image Source : Google | crushpixel ***** -dp :)
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