कलम उठाई और लफ्ज़ पिरोए कुछ बिखरे-बिखरे से, कुछ निखरे-निखरे से जो बने मिसरा मेरे काव्यों का, तुझसे ही तुझ तक मेरी बेरंग सी उमंगों का, पर तू आज भी मुझे गैर समझता है। क्या मालूम तुझे? लिखा है मैंने, हमारी पहली मुलाक़ात पर न नोंक-झोंक न टकरार सिर्फ इज़हार-ए-ख़ुमार पर। जिया है मैंने, उन पन्नों को जो आज भी इतराते हैं, तेरी हर कही बात पर। क्या सुने तूने मेरी चाहत के किस्से? क्या पता तुझे मेरे ज़माने में चर्चे ? क्या कहा तूने तू मेरा कुछ भी नहीं ? क्या लगा तुझे मैं खोई-खोई सी यूं ही रही? क्या मालूम तुझे? मेरी हर कहानी की खूबसूरती तू , हर कविता की ध्वनि तू , हर ग़ज़ल की तपिश तू, हर आरज़ू की कशिश तू। पर तू आज भी मुझे गैर समझता है। - Dirgha Pandey
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