ये कथा उस पुरुष से प्रेरित है
जिसने प्रेम किया भी खूब है
और उसे जिया भी खूब है।
पुरुष के प्रेम से आत्मविश्वास हो जाए जागृत
ये किसी चमत्कार से कम नहीं।
उसमें स्त्रीत्व की भावना भी होती है
इस में कोई विस्मय या ब्रह्म नहीं।
पौरुष वास्तव में है क्या?
शौर्य का प्रतीक
चाहे हृदय में कितनी ही पीड़ा हो।
अगर टूट जाए सब्र का बांध उसका
तो शब्दों के बाण में भी सीमा हो।
कठिन मार्ग में भी रखता जो आशा हो
और सदैव बताता धैर्य की उचित परिभाषा हो।
स्त्री का आंतरिक प्रतिबिम्ब पुरुष
स्त्री का पूरक भी पुरुष
मानो लहरों में बादलों का दर्पण
वृक्षों की टहनियों समान सागर में नदियों का समर्पण।
जैसे फूल को चूमती हवा
रोगी काया की सर्वोत्तम दवा।
प्रेम की नौका का जल
एवं स्त्री की हर दुविधा का हल।
वह पुरुष है। उसका प्रेम
कोमल जैसे आँचल में गिरता हुआ पंख
दुर्लभ जैसे समुद्र में पाया गया हो शंख।
शीतल जैसे पैरों को छूती गीली घास
मासूम जैसे प्रत्येक स्त्री की आस।
अरे!
पुरुष का प्रेम तो असंतोष में स्थिरता दे जाता है
जब कष्ट में वो तुम्हें माँ बनकर सहलाता है|
दो प्रशंसा भरे शब्द सुन मन ही मन यूँ इठलाता है
तुम्हारे सौंदर्य का बखान बस एक टकटकी लगाये ही कर पाता है।
सच में! प्रेम में पड़ा पुरुष स्वयं में ही कितना मनमोहक प्रतीत होता है|
वह पुरुष है- निष्कपट, निश्छल और अविचल प्रेमी|
ये सत्य मैंने न किसीसे जाना
और न ही सीखा है
मैंने शिव रूपी
अपने पिता को देखा है।
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-दीर्घा :)
This is the most beautiful poem you have written 👌👌👌 …….only a sensitive heart can sense this 🌸🌸
ReplyDeleteThank you :)
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