मंज़िल पाने की ख़्वाहिश किसे नहीं होती ?
टूट कर बिखर जाने का डर किसे नही होता ?
उस रास्ते के अंत तक पहुँचने के बाद
हाथ छूट जाने का दर्द किसे नहीं होता ?
जीत के भी हार जाने पर कौन नही रोता ?
शायद उसने भी यह महसूस किया होगा,
जूझा होगा,
अनुभव किया होगा
शायद उसे भी चोट लगी होगी
वह भी समाज से मिटा होगा
उसका भी उपहास हुआ होगा ।
आख़िर मुझे भी तो ताने कसे गए थे ।
कोसा गया, हर दिन ज़ख्म दिए गए
और व्यंग्यों से घेरा गया था ।
पर मेरे इरादे कभी कमज़ोर नही पड़े
क्योंकि मेरी चाहत था वो ।
बेड़ियां तोड़कर, हिम्मत जुटाकर
जो खुद को खड़ा किया था मैंनें,
उसे चाहने के लिए ।
आख़िर वो ही तो एक उम्मीद थी मेरी
जिसने हार मान ली ।
अब कुछ न रहा मेरे पास
न समाज और न ही उपहास
खलती एक ही चीज़ है मगर,
कि वो नही अब पास
न है उसके लौट आने की
कोई आस ।
-Dirgha Pandey :)
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