मैं बैठी थी बिस्तर पर अपने। साथ की दीवार पर एक खिड़की थी। खिड़की से वह पेड़ दिख रहा था। वही पेड़ जिस को बचपन में मैंने देखा था। उसकी वही टहनियां वही पत्ते वही फूल वही फल। मुझे कुछ बदला हुआ क्यों नहीं लगा? 27 साल हो गए हैं। वह पेड़ नहीं बदला, आखिर क्यों?
मेरे अंदर इतने विकार क्यों आगए? मेरे स्वभाव में इतने परिवर्तन क्यों? मैं क्यों बदल गई, मैं भी तो एक पेड़ जैसी जीव ही हूँ। फूलों जैसे मेरे भी हर किसी के संग कई रंग हैं, पत्तों जैसे मैं भी कभी हरी-हरी कभी झड़ी-झड़ी हूँ।
मेरे पैर भी टहनियों की तरह कभी-कभी डगमगा जाते हैं।
फिर भी, ऐसा क्यों हुआ?
काफी गहन मनन करने के बाद मुझे यह एहसास हुआ कि कुछ भी पहले जैसा नहीं है।
ना तुम,
ना मैं,
ना वह पेड़।
उसके फल, फूल, पत्तियां एवं टहनियां मौसम के साथ और हवा-पानी के कारणवश उसे छोड़ के चले गए। किंतु उसने निरंतर उनकी दोबारा उत्पत्ति को नहीं रोका। इसका एकमात्र कारण यही था कि उसकी जड़ें मजबूत थी। जब वह मिट्टी को तोड़ सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था उसी क्षण से उसकी वही जड़ें थी, जिन्होंने कभी उसका विरोधाभास नहीं किया। या यूं कहूं उस वृक्ष ने ही उन्हें दृढ़ रखा?
वह जड़ें,
वह नींव,
वह आधार
ही तो अटल होना आवश्यक है। वह नहीं बदलता। ठीक उसी प्रकार हमारा प्राकृतिक रूपांतरण नहीं होता। बदलता है तो सिर्फ व्यवहारिक, सामाजिक एवं शारीरिक रूप। मैं सबल हूँ अपने आचार-विचार और कर्म से, अपने अक्षर से। मुझे खुद में कोई अन्य परिवर्तन के लिए किसी को ना प्रतिपादित करने की ज़रूरत और ना ही समझाने की आवश्यकता।
उस वृक्ष में बदलाव किसी मृगतृष्णा से कम नहीं - और मुझमें भी।
मैं शून्य हूँ और रेखा भी।
मैं सब हूँ।
लेकिन मैं जो थी
वह सर्वथा रहूँगी, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही।
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- Dirgha Pandey :)
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- Dirgha Pandey :)
Always impressive 👏 ❤
ReplyDeleteBeautifully written
DeleteBeautifully written
Delete❤️❤️❤️❤️
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