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आग की जलन भी मैं,
गर्भ की तपन भी मैं,
मैं पर्वतों के धीर सी
और बर्फ में भी नीर सी।
मैं वायु का प्रकोप हूँ,
न दोहा न श्लोक हूँ,
जीत में नि:शब्दता,
हार में प्रलोभ हूँ।
कभी धूमिल सी,कभी उजली-उजली,
नाट्य पात्र बन नायिका सी
कभी हितैषी कभी बैरी,
मैं हर पहलू के हिस्से सी।
सारांश में साहित्य मैं,
संबंध में कर्तव्य भी
रेत में लिखी कहानी हूँ,
मैं मृगतृष्णा की रानी हूँ।
आक्षेप में भी फिक्र सी,
कोमल स्पर्श के ज़िक्र सी
प्रेमपूर्ण ह्रदय सहित,
सन्नाटे में कहर सी
सैकड़ों ध्वनियों की प्रदर्शनी में, कोयल भी मैं
स्वयं में बंद स्वयं से छिड़ा द्वंद्व भी मैं
कुछ परिचित, कुछ अनभिज्ञ, कभी काव्य कहानी सी
मैं शून्यता द्वारा परिभाषित, ज्ञान की पहली सीढ़ी सी।
मैं रात का खुमार भी,
अश्रु संग त्यौहार भी,
पतझड़ का वृक्ष हूँ,
और पुष्पों की बौछार भी।
यूँ गूंज में बन-ठन बहती,
मैं थिरकती मौसीक़ी सी
कुछ बेचैन, कुछ उलझी सुलझी
कुछ आज़ाद परिंदे सी।
अस्तित्व की तलाश मैं,
टूटा गुलदान भी
यादों का भंडार हूँ
और इंद्रधनुष सा रोशनदान भी।
आकाश का प्रकाश हूँ,
बिजली का विनाश हूँ।
पिता के व्यक्तित्व में,
माँ का विश्वास हूँ।
मैं नींव एक आस की,
मैं व्याकुलता प्यास की,
निराशा में भी प्रयास मैं,
लालसा सन्यास की।
लालसा सन्यास की. . . .

Too good
ReplyDeleteWell written ❤️
ReplyDeletethank you :)
DeleteHow deep… every stanza is a door to a past one lived… present one is living yet, I bet
ReplyDeletemeans a lot. Thank you :)
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