कुछ धूमिल सी, कुछ उजली-उजली
नाट्य पात्र बन नायिका सी
कभी हितैषी कभी बैरी
मैं हर पहलू के हिस्से सी
कभी ऐंठ में अफसर बन
एकाएक सीख सिखला दूं मैं
दूजी ओर सहमी सी बैठी
अपना अस्तित्व तलाशू मैं
अभिलाषाएँ इस प्रकार हावी हैं
मानो, घेराबंदी का कोई हिसाब नहीं
बेचैन और आहत मन है
फिर भी उम्मीद का कोई जवाब नहीं
फिर बचपन टटोलू
कि नयी यादें जोड़ती जाऊं?
अब समेटू इन पलों को
या गीत पिरोती जाऊं?
ठेस लगी है क्या ?
अब महसूस करने की क्षमता भी बहुत कम हो गयी है
हर व्यक्ति में फरेब दिखने लगा
घनिष्ठता भी आम हो गयी है
कुछ परिचित, कुछ अनभिज्ञ
कभी काव्य कहानी सी
मैं शून्यता द्वारा परिभाषित
ज्ञान की पहली सीढ़ी सी
अंत नहीं है मेरे चित्त का क्योंकि
आंतरिक रूप से तुम अवगत कहाँ
सलाहकारों का कारवां आया
देख मुझको जहाँ तहाँ
यूँ गूंज में बन-ठन बहती
मैं थिरकती मौसीक़ी सी
कुछ बेचैन, कुछ उलझी सुलझी
कुछ दफन-दफन, कुछ आज़ाद परिंदे सी
कुछ आज़ाद परिंदे सी
कुछ आज़ाद परिंदे सी।
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दीर्घा
ये कथा उस पुरुष से प्रेरित है जिसने प्रेम किया भी खूब है और उसे जिया भी खूब है। पुरुष के प्रेम से आत्मविश्वास हो जाए जागृत ये किसी चमत्कार से कम नहीं। उसमें स्त्रीत्व की भावना भी होती है इस में कोई विस्मय या ब्रह्म नहीं। पौरुष वास्तव में है क्या? शौर्य का प्रतीक चाहे हृदय में कितनी ही पीड़ा हो। अगर टूट जाए सब्र का बांध उसका तो शब्दों के बाण में भी सीमा हो। कठिन मार्ग में भी रखता जो आशा हो और सदैव बताता धैर्य की उचित परिभाषा हो। स्त्री का आंतरिक प्रतिबिम्ब पुरुष स्त्री का पूरक भी पुरुष मानो लहरों में बादलों का दर्पण वृक्षों की टहनियों समान सागर में नदियों का समर्पण। जैसे फूल को चूमती हवा रोगी काया की सर्वोत्तम दवा। प्रेम की नौका का जल एवं स्त्री की हर दुविधा का हल। वह पुरुष है। उसका प्रेम कोमल जैसे आँचल में गिरता हुआ पंख दुर्लभ जैसे समुद्र में पाया गया हो शंख। शीतल जैसे पैरों को छूती गीली घास मासूम जैसे प्रत्येक स्त्री की आस। अरे! पुरुष का प्रेम तो असंतोष में स्थिरता दे जाता है जब कष्ट में वो तुम्हें माँ बनकर सहलाता है| दो प्रशंसा भरे शब्द सुन मन ही मन यूँ इठलाता ...
Salvation, Redemption.
ReplyDeleteLoved this one❤️
After a long time,thanks for posting keep posting.
thank you :)
DeleteSuch a majestic work done by magician 🎩
ReplyDeleteThankyou so much Aman😊🦋
Deleteअद्भुत बहुत सुन्दर 😌😌
ReplyDeleteThanks a lot :)
Delete"ठेस लगी है क्या ?
ReplyDeleteअब महसूस करने की क्षमता भी बहुत कम हो गयी है
हर व्यक्ति में फरेब दिखने लगा
घनिष्ठता भी आम हो गयी है"
Well written, Dirgha!😊