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कुछ धूमिल सी

कुछ धूमिल सी, कुछ उजली-उजली
नाट्य पात्र बन नायिका सी
कभी हितैषी कभी बैरी
मैं हर पहलू के हिस्से सी

कभी ऐंठ में अफसर बन
एकाएक सीख सिखला दूं मैं
दूजी ओर सहमी सी बैठी
अपना अस्तित्व तलाशू मैं

अभिलाषाएँ इस प्रकार हावी हैं
मानो, घेराबंदी का कोई हिसाब नहीं
बेचैन और आहत मन है
फिर भी उम्मीद का कोई जवाब नहीं

फिर बचपन टटोलू
कि नयी यादें जोड़ती जाऊं?
अब समेटू इन पलों को
या गीत पिरोती जाऊं?

ठेस लगी है क्या ?
अब महसूस करने की क्षमता भी बहुत कम हो गयी है
हर व्यक्ति में फरेब दिखने लगा
घनिष्ठता भी आम हो गयी है

कुछ परिचित, कुछ अनभिज्ञ
कभी काव्य कहानी सी
मैं शून्यता द्वारा परिभाषित
ज्ञान की पहली सीढ़ी सी

अंत नहीं है मेरे चित्त का क्योंकि
आंतरिक रूप से तुम अवगत कहाँ
सलाहकारों का कारवां आया
देख मुझको जहाँ तहाँ

यूँ गूंज में बन-ठन बहती
मैं थिरकती मौसीक़ी सी
कुछ बेचैन, कुछ उलझी सुलझी
कुछ दफन-दफन, कुछ आज़ाद परिंदे सी

कुछ आज़ाद परिंदे सी
कुछ आज़ाद परिंदे सी।

****
दीर्घा 

Comments

  1. Salvation, Redemption.
    Loved this one❤️
    After a long time,thanks for posting keep posting.

    ReplyDelete
  2. Such a majestic work done by magician 🎩

    ReplyDelete
  3. अद्भुत बहुत सुन्दर 😌😌

    ReplyDelete
  4. "ठेस लगी है क्या ?
    अब महसूस करने की क्षमता भी बहुत कम हो गयी है
    हर व्यक्ति में फरेब दिखने लगा
    घनिष्ठता भी आम हो गयी है"

    Well written, Dirgha!😊

    ReplyDelete

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